धारणाओ पे चलने वाली ये जिंदगी,

किसी एक मुकाम से,

दूसरे मुकाम तक,

भटकना ही इसकी नियति हे


सोचता हू कभी तो मुख्त हो जाऊंगा,

रिश्ते नातों की ऊँचाइयों को,

चीरता चला जाऊंगा,

पर यहाँ तो बेदिया पड़ी हे,

कुछ बन ने की, कुछ कर दिखाने की,


कहा ढुंढु इन सब में खुद को,

कहा अपना अस्तित्व निहारु,

दंग रह जाता ह लोगो से मिल कर,


कितना हस बोल लेते हे,

कितना मुस्कुरा लेते हे,

कितनी अदा से रिश्ते निभा लेते हे,


कुछ अंदर से आब कम हो रहा हे,

मेरी संवेदना, मेरा भ्रम हो रहा हे,

मुमकिन हे की में मुस्कुरा रहा हू,

मेरी अंतिम आवस्था का आगमन हो रहा हे

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